नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को बड़ा फैसला लेते हुए तीनों कृषि कानून के लागू होने पर रोक लगा दी है। किसान आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट ने चार सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। कोर्ट ने कहा कि इस कमेटी में कौन होगा और कौन नहीं यह हम तय करेंगे। साथ ही कोर्ट ने किसानों से कहा कि अगर आप समस्या का समाधान चाहते हैं तो हमारी गठित की गई कमेटी के पास जाइए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम कृषि कानून को सस्पेंड कर सकते हैं लेकिन जमीनी हकीकत जानने के लिए कमेटी गठित कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर किसान अपनी समस्याओं का हल चाहते हैं तो उनको कमेटी के पास जाना ही होगा। कोर्ट ने कहा कि कमेटी के पास कोई भी जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर आप समाधान नहीं चाहते हैं तो धरना प्रदर्शन जारी रख सकते हैं। चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे ने कहा कि यह कमेटी आप पर अपना कोई फैसला नहीं थोपेगी, न ही आपको किसी तरह से परेशानी होगी। यह कमेटी हमें दोनों पक्षों की रिपोर्ट सौंपेगी। चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रमासुब्रमण्यम की खंडपीठ ने कहा कि किसान सरकार से बात कर सकती है तो कमेटी से क्यों नहीं। भाकियू के वकील एमपी सिंह ने कोर्ट में कहा कि किसान आंदोलन में अब महिलाएं और बच्चे शामिल नहीं होंगे। वकील एमपी सिंह के बयान को सुप्रीम कोर्ट ने दर्ज कर लिया। वहीं CJI ने कहा कि हम सकारात्मक माहौल बनाना चाहते हैं, लेकिन अगर किसान सहयोग नहीं करेंगे तो मुश्किल हैं। किसानों की तरफ से पेश वकील एमएल शर्मा ने कहा कि किसानों के साथ चर्चा के लिए काफी लोग आए लेकिन जो मुख्य है यानि कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वो क्यों नहीं बातचीत को आए। इस पर CJI ने कहा हम प्रधानमंत्री को जाने के लिए नहीं आदेश नहीं दे सकते। वैसे भी वे इस मामले में कोई पार्टी नहीं है।इस बीच केंद्र सरकार की ओर से सोमवार को देर शाम एक प्रारम्भिक हलफनामा दायर किया गया है जिसमें कहा गया कि कृषि कानूनों का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों की ओर से ऐसी अभिव्यक्ति की जा रही है कि संसद से विधेयक पारित होने से पहले केंद्र सरकार ने ये कानून बनाने के लिए किसी समिति से संपर्क नहीं किया था। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव संजय अग्रवाल की ओर से 45 पन्नों का हलफनामा दायर किया गया है।

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